Monday, February 11, 2013

मैं भी यहाँ खामोश रहू

एक तरफ नाम आँखों से 
अर्थी पैर डाले गए सिक्कों की खन खन 
दूसरी तरफ उन्ही सिक्कों को उठता 
ख़ुशी से आल्हादित बचपन 
एक तरफ मृतक के परिजनों का दुःख 
उनका करुण रुदन 
दूसरी और उन बच्चो की निर्दोष ख़ुशी 
आज जेड में जलेबी खा पाने का आनंद 
दिल असमंजस में है 
किस के लिए अफ़सोस करू 
दिमाग कहता है
चीखती चिल्लाती दुनिया की तरह
मैं भी यहाँ खामोश रहू

अमरीश जोशी "अमर"

जस्बातों के दरिया में मौजें आती है जाती है



की जस्बातों के दरिया में 
मौजें आती है जाती है 
कभी हँसती है वो मुझ पर 
कभी मुझको  हँसाती है 
की जस्बातों के दरिया में 
मौजें आती है जाती है 

कभी मैं रूठ जाता हूँ 
कभी वो रूठ जाती है
कभी मैं भी मनाता हूँ  
कभी वो भी मानती है 
की जस्बातों के दरिया में 
मौजें आती है जाती है 

कभी उम्मीद बन कर वो 
रह मुझको दिखाती है 
कभी जो दर्द में देखे,  मुझे 
तो टूट जाती है 
की जस्बातों के दरिया में 
मौजें आती है जाती है 

कर के श्रृंगार वो सोलह
कभी मुझको लुभाती है 
पूछता हूँ वजह जब भी 
वो हँस के टाल जाती है 
की जस्बातों के दरिया में 
मौजें आती है जाती है 

कभी वो बात करती है 
कभी बातें बनाती है 
कभी आँखें दिखाती है 
कभी नज़रें चुराती है 
की जस्बातों के दरिया में 
मौजें आती है जाती है 

राह तकती है वो मेरी
रोज खुद को सजाती है
जब आता हूँ गली में मैं 
वो दौड़ खडकी में आती है 
की जस्बातों के दरिया में 
मौजें आती है जाती है 

कभी वो याद करती है
कभी वो याद आती है
पास न हो जो वो मेरे
ख़ुशी भी रूठ जाती है 
की जस्बातों के दरिया में 
मौजें आती है जाती है 


अलग यूँ  है वो ज़माने से
जैसे शबनम हो बूंदों में
प्यार की धुप में देखो 
वो कैसे जगमगाती है 
की जस्बातों के दरिया में 
मौजें आती है जाती है 


याद रखती है यूँ मुझको
वो खुद को भूल जाती है 
की जस्बातों के दरिया में 
मौजें आती है जाती है 

अमरीश  जोशी "अमर 




आज दिल में तो था दरिया, मगर आँखों में नमी कम थी


नदारद थी आँगन से अम्मा 
धुप में आज गर्माहट भी कम थी 
क्यों शोर गायब था पंछी और बच्चो का 
घर में आज तो टी वी भी बंद थी 

कहा गयी मुस्कान चहरे की 
चाय में शक्कर भी कम थी 
क्यों कड़वा लगा पानी मुझे 
आज तो प्यास भी कम थी 

माँ के चहरे को रोज मैं 
अखबार सा पढ़ता हूँ 
आज दिल में तो था दरिया 
मगर आँखों में नमी कम थी 

अमरीश जोशी "अमर"

Thursday, February 7, 2013

रहे हाँ सच पे जो कायम बड़ी कीमत चुकाता है




रहे हाँ सच पे जो कायम बड़ी कीमत चुकाता है



रहे हाँ सच पे जो कायम 
बड़ी कीमत चुकाता है
दबा कर दर्द को दिल में
वो कैसे मुस्कुराता है


मुश्किलों ने किया मुफलिस 
मगर देखो खजाने को 
दिखा कर दर्द को ठेंगा 
वो ऐसे मुस्कुराता है 

रहे हाँ सच पे जो कायम 
बड़ी कीमत चुकाता है

दगा देगा तुन्हें, कैसे ?
तुम्हारा हक़ वो छीनेगा 
खजाने जो दुआओ के 
हर पल ही लुटाता है 


रहे हाँ सच पे जो कायम 
बड़ी कीमत चुकाता है


हुआ पैदा जो शक दिल में 
लगे हर रिश्ता जब झूठा 
यकीन ना हो जो अपनो को 
तो सच भी हार जाता है


रहे हाँ सच पे जो कायम 
बड़ी कीमत चुकाता है


ना मैं झूठा ,न वो झूठा 
मगर सच है कहाँ ? देखो
वो रिश्तों की दुहाई दे कर 
मुझको लुटे जाता है   


रहे हाँ सच पे जो कायम 
बड़ी कीमत चुकाता है


किया रोशन था घर जिसने 
लड़ा वो कैसे आँधी से 
बहाता है लहु अपना 
वो रिश्ते यूँ निभाता है 


रहे हाँ सच पे जो कायम 
बड़ी कीमत चुकाता है
दबा कर दर्द को दिल में
वो कैसे मुस्कुराता है

अमरीश जोशी "अमर"